साक्षी भाव ध्यान तुम्हें कर्महीन बना रहा है?
आजकल आध्यात्मिकता में साक्षी भाव की बहुत चर्चा होती है। कहा जाता है—जो हो रहा है, उसे बस देखते रहो। विचार आएं, भावनाएं आएं, सुख-दुःख आएं, परिस्थितियां बदलें—आप केवल साक्षी बने रहें।
लेकिन मेरा सवाल है—क्या केवल साक्षी बनकर देखते रहना ही जीवन का उद्देश्य है?
यदि इस विचार को इस तरह अपनाया जाए कि इंसान अपने कर्म, रिश्तों और जिम्मेदारियों से ही दूर होने लगे, तो मैं ऐसे साक्षी भाव के पक्ष में नहीं हूं।
हम इस संसार में अकेले नहीं आए हैं। हमारे माता-पिता हैं, जीवनसाथी हैं, बच्चे हैं, भाई-बहन हैं और समाज है। इन सभी के साथ हमारे संबंध हैं और इन संबंधों के साथ हमारी जिम्मेदारियां भी हैं।
तो क्या आध्यात्मिकता का अर्थ इन जिम्मेदारियों से मुक्त हो जाना है?
मेरे विचार से नहीं।
साधना हमें भीतर से मजबूत बनाए, हमारे विवेक को विकसित करे और हमें जीवन की कठिन परिस्थितियों का सामना करने योग्य बनाए—यही उसका उद्देश्य होना चाहिए।
अगर कोई आपको कहता है कि परिवार से दूर हो जाइए, रिश्तों से अलग हो जाइए और जिम्मेदारियों को छोड़कर केवल साक्षी बने रहिए, तो वहां अपने विवेक का उपयोग जरूर करें।
क्योंकि अगर केवल साक्षी होकर देखते रहना ही पर्याप्त होता, तो जब संसार में अधर्म बढ़ा, भगवान को अवतार लेकर कर्म करने की आवश्यकता ही क्यों पड़ती?
गलत होते हुए देखकर केवल चुप रहना आध्यात्मिकता नहीं हो सकती। जहां कर्म आवश्यक हो, वहां कर्म करना भी आवश्यक है।
आध्यात्मिकता हमें विकास करना सिखाती है, पलायन नहीं।
रिश्ते तोड़ना नहीं, रिश्तों को समझना सिखाती है।
जिम्मेदारियों से भागना नहीं, उन्हें निभाने की शक्ति देती है।
मेरे लिए सच्ची साधना वही है जो व्यक्ति को इतना मजबूत बनाए कि वह अपने जीवन के साथ अपने परिवार, समाज और देश के विकास में भी योगदान दे सके।
इसलिए केवल साक्षी बनकर जीवन को देखते मत रहिए।
अपने भीतर की शक्ति को जगाइए, कर्म कीजिए और अपनी जिम्मेदारियां निभाइए।
आध्यात्मिक बनिए—लेकिन कर्महीन मत बनिए।