Thursday, November 5, 2026

क्या आशीर्वाद और श्राप सच में काम करते हैं?

हमने बचपन से सुना है कि ऋषि-मुनि आशीर्वाद देते थे तो लोगों का जीवन बदल जाता था और श्राप देते थे तो जीवन में परेशानियाँ आने लगती थीं। माता-पिता से भी आशीर्वाद लेने की परंपरा रही है। लेकिन आशीर्वाद और श्राप काम कैसे करते हैं?

मेरी दृष्टि में आशीर्वाद और श्राप सकारात्मक और नकारात्मक ऊर्जा से जुड़े हैं।

संसार में हर व्यक्ति आशीर्वाद और श्राप दे सकता है। आशीर्वाद का अर्थ है किसी के लिए शुभ विचार रखना और श्राप का अर्थ है किसी के अहित की कामना करना। शुभ विचारों से सकारात्मक ऊर्जा और बुरे विचारों से नकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

लेकिन इनका प्रभाव केवल कहने से तय नहीं होता। यह देने वाले के विचारों के बल और ग्रहण करने वाले की अपनी ऊर्जा पर भी निर्भर करता है।

उदाहरण के लिए, यदि किसी ने आपको श्राप दिया, लेकिन आपकी सकारात्मक ऊर्जा उससे अधिक शक्तिशाली है, तो उसका नकारात्मक प्रभाव कमजोर या निष्क्रिय हो सकता है। इसी प्रकार कमजोर आशीर्वाद भी अधिक नकारात्मकता के सामने अपेक्षित प्रभाव नहीं दिखा पाता।

अब प्रश्न उठता है कि जब माता-पिता भी आशीर्वाद दे सकते हैं, तो लोग गुरु, महात्मा और साधकों के पास क्यों जाते हैं?

इसका कारण है साधना से प्राप्त आध्यात्मिक सामर्थ्य। साधक अपनी साधना से ऊर्जा और संकल्प शक्ति विकसित करता है। इसलिए उसका आशीर्वाद अधिक प्रभावशाली हो सकता है।

जब हम किसी साधक के पास जाते हैं, तो श्रद्धा और सकारात्मक भाव लेकर जाते हैं। फिर साधक जब सुख, समृद्धि या धनयोग का आशीर्वाद देता है, तो उसके शुभ संकल्प और हमारी ग्रहणशीलता का मेल लाभ मिलने की संभावना बढ़ा सकता है।

इसलिए आशीर्वाद लेना केवल धार्मिक औपचारिकता नहीं है। इसके पीछे आध्यात्मिक ऊर्जा और संकल्प का सिद्धांत है। आशीर्वाद जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने के साथ-साथ अदृश्य सुरक्षा कवच की तरह भी काम कर सकता है, जो अज्ञात शत्रुओं के नकारात्मक विचारों और बुरी कामनाओं से बचाने में सहायक होता है।

इसलिए विचार सकारात्मक रखिए और माता-पिता, बड़ों तथा गुरुजनों से आशीर्वाद लेते रहिए। शुभ संकल्पों का संबल जुटाइए, ताकि नकारात्मक विचार आप पर हावी न हों।