क्या आपने कभी सोचा है कि एक सामान्य व्यक्ति आध्यात्मिकता की ओर क्यों आकर्षित होता है?
अक्सर इसकी शुरुआत किसी गहरे दुख, अकेलेपन या जीवन से निराशा के बाद होती है।
जब इंसान भीतर से टूटता है, तो उसे लगता है कि शायद संसार में उसके दुख का समाधान नहीं है। वह आध्यात्मिकता की ओर मुड़ता है और उसे लगता है कि यहां उसे शांति मिल सकती है।
लेकिन यहीं से उसकी यात्रा धीरे-धीरे एक अलग दिशा लेने लगती है।
वह संसार से दूरी बनाने लगता है। पुराने रिश्ते, मित्र, परिवार और जिम्मेदारियां उसे बोझ जैसी लगने लगती हैं। उसे लगता है कि ये सब उसकी आध्यात्मिक यात्रा में बाधा हैं।
धीरे-धीरे वह अपने ही अस्तित्व से दूर होने लगता है।
जो इच्छाएं कभी जीवन का हिस्सा थीं, अब गलत लगने लगती हैं। कर्म बंधन लगने लगते हैं। संसार की खुशियां मोह दिखाई देने लगती हैं और अकेलापन उसे आध्यात्मिक उपलब्धि जैसा महसूस होने लगता है।
फिर एक समय ऐसा आता है, जब व्यक्ति जीवन से ही थकने लगता है।
वह संसार से जितना दूर होता जाता है, उतना ही अकेला होता जाता है। और जब मन जीवन से हारने लगता है, तब उसी हार को एक नया नाम दे दिया जाता है—मोक्ष।
लेकिन जरा रुककर सोचिए...
क्या मोक्ष वास्तव में जीवन से मुक्ति है?
या यह कभी-कभी दुखी मन का खुद को दिया हुआ ऐसा विश्वास है, जिससे वह अपने संघर्ष और जिम्मेदारियों से बच सके?
यदि परमात्मा का उद्देश्य हमें संसार से मुक्त करके निष्क्रिय बना देना ही होता, तो हमें जन्म ही क्यों दिया जाता?
जीवन मिला है तो उसका उद्देश्य कर्महीन होकर मृत्यु की प्रतीक्षा करना नहीं हो सकता।
सच्चा ज्ञान आपको जीवन से दूर नहीं करता। वह आपको जीवन को अधिक समझदारी और जागरूकता के साथ जीना सिखाता है।
ज्ञान प्राप्त करने के बाद भी बुद्ध अपने परिवार को अपने पास बुलाते हैं। तुलसीदास भी जीवन और समाज से कटकर नहीं रहते।
इसलिए आध्यात्मिकता का अर्थ रिश्तों, जिम्मेदारियों और कर्मों से विमुख होना नहीं है।
हमें नई सोच और नई ऊर्जा के साथ सचेत होकर जीना है, अपने परिवार और समाज के प्रति जिम्मेदार रहना है और प्रकृति के संरक्षण में अपना योगदान देना है।
जागरण वह नहीं, जिसमें आप जीवन से भाग जाएं।
जागरण वह है, जिसमें ज्ञान के बाद आपका जीवन पहले से अधिक सार्थक हो जाए।