Saturday, October 31, 2026

भीष्म ने दुर्योधन को धोखा दिया था!

महाभारत में कौरवों की हार का कारण केवल श्रीकृष्ण की रणनीति नहीं थी। मेरी दृष्टि में इसका एक बड़ा कारण भीष्म पितामह की निष्ठा भी थी।

सोचिए, जिस दुर्योधन ने भीष्म पितामह को अपनी विशाल सेना का सेनापति बनाया, क्या भीष्म वास्तव में उसकी विजय चाहते थे?

भीष्म पितामह ने जीवनभर अपनी प्रतिज्ञाओं का पालन किया था। उन्हें इच्छामृत्यु का वरदान भी प्राप्त था। वे महान योद्धा थे और युद्ध का असाधारण अनुभव रखते थे।

लेकिन जब युद्ध में शिखंडी उनके सामने आया, तो उन्होंने उस पर शस्त्र न उठाने का निर्णय लिया। मेरी दृष्टि में यहाँ एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है।

क्या शिखंडी पर प्रहार न करने का अर्थ यह भी था कि वे अपनी रक्षा नहीं कर सकते थे? क्या वे शिखंडी को छोड़कर अर्जुन और दूसरी पांडव सेना का सामना नहीं कर सकते थे? क्या उनके पास युद्ध जारी रखने के दूसरे विकल्प नहीं थे?

मेरे विचार से भीष्म पितामह के मन में पांडवों के प्रति जो स्नेह था, वह दुर्योधन के प्रति उनकी सेनापति वाली जिम्मेदारी से बड़ा हो गया था।

उन्होंने दस दिनों तक युद्ध किया, लेकिन क्या उन्होंने अपनी पूरी क्षमता और मन से दुर्योधन की विजय के लिए युद्ध किया? यही वह प्रश्न है, जिस पर विचार होना चाहिए।

दुर्योधन ने उन पर भरोसा करके अपने राज्य और सेना की सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी थी। लेकिन मेरी दृष्टि में भीष्म की आंतरिक निष्ठा उस जिम्मेदारी के अनुरूप नहीं थी।

इस घटना से हमें जीवन की एक बहुत बड़ी सीख मिलती है।

जब कोई व्यक्ति मन से आपके साथ न हो, तो केवल उसके पद, अनुभव, रिश्ते या पुरानी प्रतिष्ठा देखकर उसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी कभी न दें।

क्योंकि संकट के समय वही व्यक्ति आपके लिए उतना नहीं करेगा, जितनी आप उससे अपेक्षा रखते हैं। वह अपने स्वार्थ, संबंधों और व्यक्तिगत विचारों को आपकी जिम्मेदारी से ऊपर रख सकता है।

इसलिए किसी पर विश्वास करने से पहले यह समझना जरूरी है कि उसकी वास्तविक निष्ठा किसके प्रति है।

गलत व्यक्ति पर किया गया भरोसा केवल नुकसान नहीं पहुँचाता, बल्कि कभी-कभी आपकी पूरी व्यवस्था को ही पराजित कर देता है।

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