मोक्ष का अर्थ क्या है? क्या मोक्ष का अर्थ जन्म-मरण से मुक्ति है?
हमने अक्सर सुना है कि मोक्ष का अर्थ जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्त होकर परमात्मा में विलीन हो जाना है। लेकिन मेरे विचार में मोक्ष का अर्थ जन्म-मरण से मुक्ति नहीं है।
यदि आत्मा को चेतना माना जाए, तो चेतना का पूरी तरह बंधन-मुक्त होना संभव नहीं है। जब तक चेतना अस्तित्व में है, तब तक वह किसी न किसी अवस्था में रहेगी, अनुभव करेगी और अपनी यात्रा जारी रखेगी।
इसलिए केवल विचारों को रोक देना, मन को शून्य कर देना या तर्क करने की प्रवृत्ति को कम कर देना मोक्ष नहीं है। यह चेतना की अवस्था पर नियंत्रण प्राप्त करने की प्रक्रिया है।
साधना का उद्देश्य चेतना को समाप्त करना नहीं, बल्कि उसकी शक्ति और नियंत्रण को बढ़ाना है। जब हम अपनी चेतना की अवस्था को समझकर उसे अपनी इच्छा के अनुसार अधिक समय तक एक ही अवस्था में स्थिर रख पाते हैं, तब चेतना पर हमारा नियंत्रण बढ़ता है।
इसी संदर्भ में समाधि को समझना चाहिए। समाधि चेतना की एक अत्यंत स्थिर अवस्था है, जिसमें मानसिक गतिविधियों का हस्तक्षेप बहुत कम हो सकता है। लेकिन समाधि और मोक्ष एक ही चीज नहीं हैं।
समाधि एक अवस्था है, जबकि हमारे दृष्टिकोण में मोक्ष का अर्थ है—चेतना पर नियंत्रण प्राप्त करना और उसे लंबे समय तक एक ही अवस्था में स्थिर बनाए रखना।
अब जन्म और मृत्यु को समझिए।
ऊर्जा नष्ट नहीं होती, केवल अपना स्वरूप बदलती है। चेतना भी अपने स्वरूप को बदलते हुए आगे बढ़ती है। इसी बदलते स्वरूप को पुनर्जन्म कहा जाता है। इसलिए शरीर की मृत्यु को चेतना की यात्रा का अंत नहीं माना जा सकता।
और आत्मा किसी ईश्वर में पूरी तरह विलीन होकर अपनी स्वतंत्रता समाप्त नहीं करती। हर आत्मा स्वतंत्र है और अपनी यात्रा स्वतंत्र रूप से करती है।
इसलिए मोक्ष कोई अंतिम मंजिल नहीं है। मोक्ष चेतना की अवस्था पर नियंत्रण है—अपनी चेतना को समझना, नियंत्रित करना और उसे एक अवस्था में लंबे समय तक स्थिर बनाए रखना।
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