कुण्डलिनी ऊर्जा क्या है और यह कैसे जागती है?
कुण्डलिनी के बारे में आपने बहुत सुना होगा, लेकिन आखिर कुण्डलिनी है क्या और यह जागती कैसे है?
रीढ़ की हड्डी के अंदर सूक्ष्म नाड़ियों का एक समूह माना जाता है। इन नाड़ियों में रक्त का प्रवाह पर्याप्त होता है, लेकिन सामान्य अवस्था में आकाशीय ऊर्जा की मात्रा कम होती है। इसलिए इस नाड़ी समूह को सुप्त अवस्था में माना जाता है।
इसे एक सरल उदाहरण से समझिए। जैसे लकवे की स्थिति में शरीर के किसी हिस्से में रक्त का प्रवाह बना रह सकता है, लेकिन तंत्रिका संकेतों में बाधा के कारण उस अंग की सामान्य गतिविधि प्रभावित हो जाती है। उसी प्रकार कुण्डलिनी की अवधारणा में माना जाता है कि नाड़ियों में रक्त प्रवाह होने के बावजूद आकाशीय ऊर्जा का पर्याप्त प्रवाह न होने से यह शक्ति सुप्त रहती है।
अब सवाल है—यह सुप्त शक्ति जागती कैसे है?
जब व्यक्ति नियमित रूप से सही विधि से मन्त्र जप, प्राणायाम, योग, ध्यान और आध्यात्मिक साधना करता है, तो साधना के प्रभाव से इन सूक्ष्म नाड़ियों में आकाशीय ऊर्जा का प्रवाह धीरे-धीरे बढ़ने लगता है।
जब इस नाड़ी समूह में आकाशीय ऊर्जा का प्रवाह पर्याप्त मात्रा में होने लगता है, तब सुप्त अवस्था में रहने वाली शक्ति जागृत होने लगती है। इसी प्रक्रिया को कुण्डलिनी जागरण कहा जाता है।
लेकिन कुण्डलिनी जागरण केवल ऊर्जा के जागने तक सीमित नहीं है। उस ऊर्जा को नियंत्रित करना और सही दिशा में उपयोग करना भी उतना ही महत्वपूर्ण माना जाता है। इसी नियंत्रण और सही उपयोग को साधना में सिद्धि से जोड़ा जाता है।
आकाशीय ऊर्जा के प्रभाव से शारीरिक और मानसिक विकास, एकाग्रता, मानसिक शक्ति और आन्तरिक जागरूकता में वृद्धि होने की बात कही जाती है।
इसलिए कुण्डलिनी जागरण को केवल कोई चमत्कार नहीं समझना चाहिए। यह साधना, ऊर्जा के जागरण और उसके नियंत्रण से जुड़ी एक क्रमिक प्रक्रिया है।
यदि आप कुण्डलिनी साधना को सही दिशा में समझना और आगे बढ़ाना चाहते हैं, तो मन्त्र दीक्षा और आध्यात्मिक मार्गदर्शन के लिए संपर्क करें।
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