क्या साधना करने के लिए सुबह 3 बजे उठना या ब्रह्म मुहूर्त में ही साधना करना जरूरी है? मेरे अनुसार, यदि आप साधना अपनी इच्छापूर्ति और समस्याओं के समाधान के लिए कर रहे हैं, तो रात 10 बजे के बाद या सोने से पहले का समय अधिक उपयोगी हो सकता है।
आखिर हम साधना क्यों करते हैं? अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए, जीवन की समस्याओं का समाधान पाने के लिए और अपने मनचाहे उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए।
साधना का उद्देश्य मंत्रों की संख्या गिनना नहीं है और न ही केवल कठिन नियमों का पालन करना। हमारा मुख्य उद्देश्य है इच्छापूर्ति। इसलिए हमें यह भी विचार करना चाहिए कि साधना का कौन-सा समय और तरीका हमारे उद्देश्य के लिए अधिक सहायक हो सकता है।
अब देखिए, जब हम सुबह साधना करते हैं, तो मन में दिनभर की जिम्मेदारियाँ भी चलती रहती हैं। परिवार, नौकरी, व्यापार, धन और भविष्य की चिंताएँ हमारा ध्यान अपनी ओर खींचती हैं। साधना पूरी होते ही हम फिर उन्हीं कामों में लग जाते हैं। इस प्रकार हमारा ध्यान और मानसिक ऊर्जा सांसारिक कार्यों में लगने लगती है।
इसके विपरीत, रात 10 बजे के बाद दिनभर के अधिकांश कार्य समाप्त हो चुके होते हैं। हम शांत वातावरण में साधना कर सकते हैं और उसके तुरंत बाद सो सकते हैं। इस तरह साधना के बाद बाहरी गतिविधियों में उलझने के बजाय हमें विश्राम करने का अवसर मिलता है।
ध्यान देने वाली बात यह भी है कि कुछ साधना-पद्धतियों में साधना के बाद उसी साधना-स्थल पर सोने का विधान मिलता है। अर्थात साधना के बाद भी उसी वातावरण में बने रहने को महत्व दिया गया है।
मेरे अनुसार, रात की साधना का लाभ यही है कि हम अपने संकल्प और साधना के लिए अलग समय निकालने के साथ-साथ उसके बाद का समय भी शांत अवस्था में बिता सकते हैं।
जब लक्ष्य इच्छापूर्ति है, तो साधना को अनावश्यक रूप से कठिन बनाने के बजाय ऐसे सरल और उपयोगी तरीके को अपनाना चाहिए, जो हमारे उद्देश्य की प्राप्ति में अधिक सहायक हो। इसी दृष्टिकोण से मैं रात 10 बजे के बाद या सोने से पहले की साधना को विशेष महत्व देता हूँ।
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